जिंदगी बदल देने वाली हिंदी कहानियों का संग्रह

एक अच्छी सीख जिंदगी बदल सकती हैं बस समझने की और अपनाने की जरूरत हैं। यहां मैं आपके साथ छोटी-छोटी हिंदी कहानियों का संग्रह शेयर कर रहा हूँ जिनसे आपको बहुत बड़ी सीख मिल सकती हैं। आईये पढ़ते हैं अच्छी सीख देने वाली हिंदी कहानियाँ जो आपकी जिंदगी बदल सकती हैं।

हिंदी कहानियों का संग्रह

एक लडकी ने एक बुजुर्ग से पूछा की सच्चा प्यार बहुतों को नसीब नहीं होता, इसमें हकीकत क्या हैं? बुजुर्ग ने कहा, फूलों के बाग में जाओ और जो सबसे खुबसुरत फुल हो वो फुल ले आओ। लडकी दुसरे दिन वापस आयी और बोली, मैं कई सारे फुल देखती रही, एक फुल सबसे खुबसुरत था पर मैं उस फुल से और बेहतर फुल की तलाश में आगे चलती गयी पर कोई फुल प्यारा नहीं लगा।

जब मैं वापस उसी पहले वाले खुबसुरत फुल के पास लौटी तो उसे कोई और तोड़ चूका था। तब बुजुर्ग ने कहा की यही प्यार की हकीकत हैं, जो सामने होता हैं उसकी कदर नहीं होती और जब वापस लौटों तो वो भी नहीं मिलता इसलिए सच्चा प्यार बहुतों को नसीब नहीं होता हैं।

प्रेरणादायक हिंदी कहानियों का संग्रह

बुरी आदत वाले के लिए अपनी अच्छी आदत क्यों छोड़े

एक आदमी रास्ते में मिलने वाले हर आदमी से नमस्कार करता था ये उस आदमी की रोजमर्रा की आदत थी पर एक व्यक्ति उसके नमस्कार का जवाब गाली से देता था। एक दिन उस आदमी से किसी ने पूछा "वो आदमी हर रोज तुम्हें बुरा भला कहता हैं, तुम फिर भी उसे नमस्कार क्यों करते हो तो उस नेक आदमी ने जवाब दिया की "जब वो मेरे लिए अपनी बुरी आदत नहीं छोड़ सकता तो मैं उसके लिए अपनी अच्छी आदत क्यों छोड़ दूँ।

खुशी का रहस्य

एक बार 40 लोगों का एक प्रतिनिधि मण्डल एक सेमिनार में वक्ता को सुन रहा था उस समय वे प्रसन्नता पर भाषण दे रहे थे तभी अचानक वक्ता चुप हो गए और सभी को एक-एक गुब्बारा देते हुए बोले "आप सभी गुब्बारे पर अपना नाम लिखे दें।" जब सभी ने नाम लिख दिए तो वक्ता ने सभी गुब्बारे इकट्ठे किए और और पास के एक कक्ष में छोड़ आए।

इसके बाद उन्होंने सभी प्रतिनिधियों से 5 मिनट में अपने नाम का गुब्बारा उठाकर लाने को कहा। देखते ही देखते उस कक्ष में अफरा तफरी का माहौल बन गया। सभी के चेहरों पर कठोरता नजर आ रही थी। पांच मिनट बीत गए लेकिन कोई भी अपना गुब्बारा नहीं ढूंढ पाया। अब वक्ता ने उन्हें धैर्य और शांतिपूर्वक जिस व्यक्ति को जिसके नाम से गुब्बारा मिले उसे देने को कहा।

एक मिनट में हर व्यक्ति के हाथ में उसके नाम का गुब्बारा था। वक्ता ने फिर कहा, बिलकुल ऐसा ही मनुष्य के जीवन में होता हैं। हर कोई खुशी की तलाश में इधर से उधर बैचैनी से धूम रहा हैं जबकि यह नहीं जानता की खुशी मिलेगी कहां? प्रसन्नता दूसरों से छीना झपटी करने से नहीं दूसरों के देने में छिपी रहती हैं।

दूसरों को प्रसन्नता देकर तो देखिए आपको खुद प्रसन्नता मिल जाएगी। ढूंढने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। यही तो मनुष्य जीवन का उद्देश्य हैं। वहां आए प्रतिनिधियों के चेहरे पर अब प्रसन्नता झलक रही थी।

सूरज और हवा

एक बार सूरज और हवा में बहस छिड़ गई। सूरज हवा से बोला "मैं अधिक ताकतवर हूँ" हवा बोली "मैं ज्यादा ताकतवर हूँ।" बात प्रतियोगिता तक पहुँच गई। दोनों में तय हुआ की जो भी राहगीर के कंधे पर से शोल को हटा देगा, वही ज्यादा ताकतवर होगा। पहले हवा ने अपनी ताकत दिखाई। तेज हवा से राहगीर को ठंड लगने लगी। उसने अपनी शोल को अपने शरीर पर कस कर लपेट लिया। हवा चलते-चलते थक गई। अब सूर्य की बारी थी। गर्मी के कारण राहगीर ने अपनी शाल उतारकर रख दी। सूर्य मुस्कुराने लगा, क्योंकि जीत सूर्य की हुई थी।

सीख:- कभी घमंड नहीं करना चाहिए।

शेर और चूहा

एक बार एक शेर अपनी गुफा में सो रहा था तभी एक चूहा न जाने कहा से आकर शेर के ऊपर उछलने लगा। जिससे शेर की नींद खराब हो गयी और वो जाग गया। शेर को चूहे पर इतना गुस्सा आया की उसने शरारती चूहे को अपने पंजों में जकड़ लिया और उसे मारने की सोचने लगा। चूहा बहुत डर गया। उसने थरथराते हुए शेर से कहा "हे जंगल के राजा शेर मुझे माफ कर दीजिए, मुझसे गलती हो गई हैं।

आप मेरी जान बक्स देंगे तो आपका मुझ पर बहुत बड़ा एहसान होगा और आपके इस एहसान को में वक्त आने पर जरूर चूका दूँगा।" यह सुनकर शेर को चूहे पर दया आ गई और उसने चूहे को जाने दिया पर शेर मन ही मन हँसा और खुश हुआ की भला ये छोटा सा चूहा मेरा एहसान क्या चुकाएगा।

समय बीतता गया और हमेशा की तरह शेर एक बार जंगल में शिकार की तलाश में घूम रहा था की एक शिकारी ने शेर को बड़ी आसानी और चालाकी से अपने झाल में पकड़ लिया। शेर मदद के लिए जोर-जोर से दहाड़ मारने लगा। शेर की दहाड़ सुनकर चूहा वहाँ पहुँचा। शेर को जाल में फँसा देखकर चूहे ने तुरन्त अपने नुकीले दाँतों से शिकारी का जाल काट दिया और शेर को आजाद कर दिया।

शेर ने चूहे का खूब धन्यवाद कहा। उस दिन शेर को समझ आया की किसी भी प्राणी की काबिलियत उसके भारी रूप से नहीं लगानी चाहिए और कभी छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं करना चाहिए। हमेशा सबकी मदद करनी चाहिए क्योंकि जो दूसरों की मदद करता हैं उसकी सब मदद करते हैं।

गुरु की सीख

एक बार एक शराब का एक व्यसनी एक संत के पास गया और विनम्र स्वर में बोला, " गुरुदेव, मैं शराब के व्यसन से बहुत ही दुखी गया हूँ।" इसकी वजह से मेरा घर बर्बाद हो रहा हैं। मेरा परिवार भूखा मर रहा हैं, लेकिन मैं शराब के बिना रह नहीं पाता! मेरे घर की शांति नष्ट हो गयी हैं। कृपया आप मुझे कोई आसान उपाय बताएँ, जिससे मैं अपने घर की शांति फिर से पा सकूँ।"

गुरुदेव ने कहा, "जब इस व्यसन से तुमें इतना नुकसान होता हैं, तो इसे छोड़ क्यों नहीं देते?" व्यक्ति बोला, "पूज्यश्री मैं इस शराब को छोड़ना चाहता हूँ, पर यह मेरे खून में इस कदर समा गयी हैं की मुझे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही हैं।" गुरुदेव ने हँस का कहा, " कल तुम फिर आना! मैं तुम्हें बता दूँगा की शराब कैसे छोड़नी हैं?"

दुसरे दिन निश्चित समय पर वह आदमी महात्मा के पास पहुँच गया। उसे देख कर महात्मा खट से खड़े हुए और एक खम्भे को कस कर पकड़ लिया। जब उस आदमी ने महात्मा को इस दशा में देखा, तो कुछ समय तो वह मौन खड़ा रहा, पर जब काफी देर पश्चात् भी महात्मा ने उस खम्भे को नहीं छोड़ा, तो उससे रहा नहीं गया और पूछ बैठा की "गुरुदेव, आपने व्यर्थ इस खम्भे को क्यों पकड़ रखा हैं?"

गुरुदेव बोले, वत्स! मैंने इस खम्भे को नहीं पकड़ा हैं, यह खम्भा मेरे शरीर को पकड़े हुए हैं। मैं चाहता हूँ की यह मुझे छोड़ दे, किन्तु यह खम्भा तो मुझे छोड़ ही नहीं रहा हैं।" उस व्यक्ति को अचम्भा हुआ! वह बोला, "गुरुदेव मैं शराब जरूर पिता हूँ, मगर मूर्ख नहीं हूँ। आपने ही इस खम्भे को जानबूझ कर कस के पकड़ रखा हैं।

यह तो निर्जीव हैं यह आपको कैसे पकड़ेगी यदि आप दृढ संकल्प कर लें, तो इसी वक्त इस खम्भे को छोड़ सकते हैं। गुरुदेव बोले, नादान मनुष्य यही बात तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ की जिस तरह मुझे खम्भे ने नहीं बल्कि मैंने ही उसे पकड़ रखा था, उसी तरह इस शराब ने तुम्हें नहीं पकड़ा हैं, बल्कि सच तो यह हैं की तुमने ही शराब को पकड़ रखा हैं।

तुम कह रहे थे की यह शराब मुझे नहीं छोड़ रही हैं जबकि सच यह हैं की तुम अपनी यह ख़राब आदत की वजह से खुद ही इसे नहीं छोड़ रहे। अगर तुम अपने मन में यह दृढ संकल्प निश्चय कर लो की मुझे इस व्यसन का त्याग अभी कर देना हैं, तो इसी वक्त तुम्हारी शराब पीने की आदत छुट जाएगी।

शरीर की हर क्रिया मन के द्वारा नियंत्रित होती हैं और मन में जैसी इच्छा-शक्ति प्रवल होती हैं, वैसा ही कार्य सफल होता हैं।" वह शराबी गुरू के इस अमृत-वचनों से इतना प्रभावित हुआ की उसने उसी वक्त भविष्य में शराब ने पीने का दृढ संकल्प किया। उसके घर में शांति लौट आयी और वह शांति से जीवन-यापन करने लगा।

इस अच्छी सीखे देने वाली कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती हैं की जीवन में कोई व्यसन ऐसा नहीं हैं, जिसे एक बार ग्रहण करने के बाद छोड़ा ना जा सके। अगर मनुष्य चाहे तो बड़ी से बड़ी बुराई का त्याग कर सकता हैं।

सीख:- मनुष्य चाहे तो बड़ी से बड़ी बुराई का त्याग कर सकता हैं।

एकता का महत्व

एक बार कुल्हाड़ों से भरा एक ट्रक जंगल से गुजर रहा था। सभी पेड़ इसे देख रहे थे। सभी पेड़ रोने लगे यह कहा कर की इन कुल्हाड़ों से जंगल को काटा जाएगा। हमारा विनाश निकट हैं। तभी एक बुजुर्ग पेड़ ने उनकी समस्या का निवारण करते हुए कहा की "हमें घबराने की जरूरत नहीं हैं। सभी पेड़ों से आश्चर्य से पूछा - 'वो कैसे?'

तब उस बुजुर्ग पेड़ ने बताया - जब तक हममें से बिंडा (हत्था) बनकर कुल्हाड़े का साथ कोई नहीं देगा तब तक अकेला कुल्हाड़ा हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मनुष्य हमें तबाह नहीं कर रहा हैं बल्कि हमारी आपसे फूट हमें नष्ट कर रही हैं।

सीख

अपने समय के प्रसिद्ध और सबसे अच्छा लुकमान बड़े ही शिष्टाचारी, सभ्य और विनम्र थे। रोगी उनके स्वभाव (nature) से बहुत प्रभावित रहते थे। एक बार एक रोगी ने उनसे पूछा की "आपने इतना शिष्टाचार और सभ्य आचरण कहां से सिखा? लुकमान ने जवाब दिया "अशिष्ट और असभ्य लोगों से।" बात रोगी के समझ नहीं आयी। उसने लुकमान से आश्चर्यचकित होकर कहा की "यह कैसे हो सकता हैं?"

लुकमान ने उसे समझाते हुए कहा "इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं हैं। मैंने अशिष्ट और असभ्य लोगों में जो बुरी बातें देखी या उनकी जो आदत मुझे बुरी लगी, उसे मैंने छोड़ दिया। जो बात मुझे अच्छी नहीं लगी वह दूसरों को भी बुरी लग सकती हैं। इसलिए दूसरों का जो व्यवहार तुम्हें अच्छा नहीं लगता, दूसरों के साथ तुम भी वैसे व्यवहार मत करो।"

मूर्ख और समझदार

एक आदमी ने से महापुरुष से पूछा की "श्रीमानजी मूर्ख व्यक्ति को लोग गधा क्यों कहते हैं उसके साथ मूर्ख की तुलना क्यों करते हैं?" महापुरुष ने जवाब दिया - जिसमें गलत धारणा होती हैं वह गधा हैं। गलत यानि मिथ्या धारणा वाला मूर्ख होता हैं इसलिए मूर्ख आदमी को लोग गधा कहते हैं।

मूर्ख और समझदार में यही अंतर होता हैं की मूर्ख अपनी गलत धारणा होने पर भी अपनी गलती नहीं मानता हैं पर समझदार अपनी भूल को स्वीकार कर लेता हैं। मूर्ख उस मक्खी के समान हैं जो मिष्ठान को छोडकर गंदगी पर बैठती हैं। समझदार मधुमक्खी के सामान हैं जो सभी फूलों से मकरंद लेकर शहद इकठ्ठा करती हैं।

लालची कुत्ता

एक बार एक कुत्ते को बहुत जोर से भूख लगी थी। तभी उसे एक रोटी मिली। वह उस रोटी का पूरा आनंद लेना चाहता था। इसलिए वह उसे शांति में बैठकर खाने की इच्छा से रोटी को मुँह में दबाकर नदी की और चल दिया। नदी पर छोड़ा पुल था। जब कुत्ता नदी पार कर रहा था तभी उसे पानी में अपनी परछाई दिखाई देती हैं।

उसने अपनी परछाई को दूसरा कुत्ता समझा और उसकी रोटी छिनना चाहा। रोटी छिनने के लिए उसने भौंकते हुए नदी में छलांग लगा दी। मुँह खोलते ही उसके मुँह से रोटी नदी के पानी में गिरकर बह गयी और लालची कुत्ता भूखा ही रह गया। इसलिए कहते हैं की हमें लालच नहीं करना चाहिए।

सीख:- हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए।

जीवन में पुरुषार्थ का महत्व - प्रेरणादायक कहानी

एक बार एक साधू नदी के किनारे बैठ कर माला जप कर रहा था। एक आदमी साधू को बहुत देर से ऐसा करते हुए देख रहा था उस आदमी से रहा नहीं गया। वह साधू के पास गया और उससे पूछा की "आप इतनी देर से क्या कर रहे हैं?" साधू बोला दिखाई नहीं देता मैं जप कर रहा हूँ। उस आदमी ने साधू से पूछा - आपके इस जप से क्या होगा? साधू थोड़े गुस्से में बोले - इससे स्वर्ग की प्राप्ति होगी इसलिए इतनी देर से अकेला बैठ कर जप कर रहा हूँ।

वह आदमी वही साधू के पास बैठ गया और पास में पड़ी बालू उठा-उठा कर नदी में फेंकने लगा। साधू ने उसे ऐसा करते देख कर पूछा की "तुम ये क्या कर रहा हो?" वह आदमी बोला मैं नदी में पुल बना रहा हूँ। तो साधू बोले 'मित्र पुल इस तरह नहीं बनते' उसके लिए इंजीनियर, श्रमिक, धन और जरूरी सामान जुटाना पड़ता हैं उसके समन्वित प्रयासों से पुल तैयार होते हैं। महज बालू डालने से पुल नहीं बनता।

साधू की बात सुनकर वह आदमी तुरन्त साधू से बोला "यही तो मैं कहना चाहता हूँ" सिर्फ मत्र बोलने या माला जपने से स्वर्ग प्राप्त नहीं होता। इसके लिए संयम, ज्ञान, पुरुषार्थ जैसे काम भी करने होंगे। एक साधारण आदमी से ऐसी महत्वपूर्ण बात सुनकर साधू की आँखें खुल गई। उसने अपनी गलती स्वीकार की और फिर कर्म योगी बन गया।

सीख:- हमें अपने कर्मों से ही स्वर्ग या नरक मिलता हैं इसलिए अपने कामों को पूरी ईमानदारी से करना ही सच्ची पूजा हैं।

आशा करता हूँ आपको इस हिंदी कहानियों का संग्रह में से किसी कहानी से अच्छी सीख मिलेगी और आप उस सीख से अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लायेंगे।

इस हिंदी कहानियों का संग्रह को अपने दोस्तों के साथ साझा अवश्य करें।

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मुझे लिखने का बहुत शौक है। इस ब्लॉग पर मैं एजुकेशन और फेस्टिवल से रिलेटेड आर्टिकल लिखता हूँ।

Comments ( 2 )

  1. Achhapost Aapne Kiya Hai Sir Bahut Badhiya Hai Sir

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  2. Aapne Bahut Badhiya Kahani Sunaye jamshed Bhai

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